"जंग" छिड़ेगी "जंग"
'जंग' छिडेग़ी 'जंग' अब, 'जंग' छिड़ेगी 'जंग'...!, 'इस-जिस्म' की 'बर्बादी' तक.., 'इस-रूह' की 'आजादी' तक..! 'रुसवाई' से 'तन्हाई' तक.., 'सादगी' से 'बे-हयाई' तक..! अब, 'जंग' छिड़ेगी 'जंग'..!, तेरे 'भोले-पन' से, 'मेरी - आवारगी' तक.., मेरे 'पागल-पन' से, 'तेरी - दीवानगी' तक..! अब, 'जंग' छिड़ेगी 'जंग'...! " ये 'जिंद' मेरे हाथ से, 'रेत' की 'मानिन्द' 'खिसकने तक'..," और... 'भीगे - तकिये' पे, 'नम' 'चेहरे' की..,...